कृष्णशंकर

कृष्णशंकर

रविवार, १३ दिसम्बर २००९

कवितायें

ताजमहल

ताजमहल का ताजमहल होना
सचमुच का ताजमहल होना है
जैसे आगरे का ताजमहल।

ताजमहल यदि सच्चा ताजमहल है
वह प्रेम का मिन्दर होगा
जैसे मैं और उनका प्रेम।

ताजमहल कहते सुनते ही
रोमांचित हो उठता है जिसका तनम न
समझो हो गया है उसे कुछ कुछ
एक और ताजमहल बनाने का रोग।

लोग घरों में ताजमहल नहीं
पे्रम भवन सजा रखते हैं
यादें बनी रहे ताजा उम्रभर
दिलाते हुए याद एक दूजे को।

मैं तेरा शाहजहां ,मुमताजमहल तू मेरी
गाते रहेंगे सुर ताल मिलाकर
यमुना संभाले रखेगी जब तक
पूरनमासी में जगर मगर करता ताजमहल ।

जन्नत है तो कहीं और नहीं
हुस्न है तो कहीं और नहीं
इश्क है तो कहीं और नहीं
जिस्त है तो कहीं और नहीं
ख्वाब है तो कहीं और नहीं
यादें है तो कहीं और नहीं
तसव्वुर है तो कहीं और नहीं
सिर्फ आगरे जाकर देखो यमुना किनारे

नत , हुस्न, इश्क , जिस्त ,ख्वाब
यादे-तसव्वुर एक साथ दिखाई देंगे
जगर मगर करते हुए दुधिया रातो में

ताजमहल का ताजमहल होना ही
सचमुच का प्रेममहल होना है
जैसे आगरे का ताजमहल
जैसे मैं और उनका पे्रम ।
0000......28/06/2007 गुरूव
जगह

अलावा इसके हो क्या सकता है कि
अब तक न बनवा सका
हृदय में उनके ज़रा सी जगह।
उम्र के उस पड़ाव पर होना चाहिए था
जिस पड़ाव पर वे खड़े है
जिस बात पर वे अड़े हैं
चुनने की अकांक्षा लिए हुए कोई फूल
बासा और उजड़ा हुआ बागान
क्या करेंगे सजाकर वे।
कब का हो जाना चाहिए था निर्णय
या कैद हो जाना चाहिए थी उम्र भर की
या खुल्ला छोड़ दिया जाना चाहिए था
बेलगाम भटकने के लिए।
कम से कम बन ही जानी चाहिए थी अब तक जगह
जिससे पुरसुकून हो सकें
कि कैद कर लिया गया है उम्र भर
कि खुल्ला छोड़ दिया गया हूं सांड की तरह ।
फिर करना चाहता हूं निवेदन
अब तो खुला छोड़ दो दरवाज़ा
आ जा सकूं निस दिन चाहे जब
बनवा सकूं एक छोटी सी जगह
हृदय के उनके किसी कोने में।

00 01.07.2007...1:30 बजे

जन्म दिन का गणित

माँ ने बताया
जिस दिन तू पैदा हुआ
उस दिन पूनम की सुबह थी
सारा दिन रिमझिम रिमझिम पानी बरस रहा था
गाय,भैंस और बकरियाँ
चरने चली गई थी जंगल
स्कूल की छुटि्टयाँ खत्म हो गई थी
पड़ौसी की लड़की
स्कूल जाने लग गई थी
और हाँ ,जिस साल तू पैदा हुआ था
उसी साल पं.जवाहरलाल नेहरू आये थे
उद्घाटन करने कारखाने का
लग गई थी तेरी नाक
हाथों में उनके, और
मुस्करा दिये थे पंडित नेहरू ।
पूरे पचपनवे बरस के दिन
जब ताजमहल को
सातवे अजूबे में
शामिल करने की मूहिम चल रही थी
और निर्णय होना शेष रह गया था
सप्ताह का सातवां दिन था
महिने की सातवीं तारीख थी
साल का सातवां महिना था
सदी का सातवां वर्ष था
यानी सभी सात सात सात।
तब मैं अकेला एकान्त में बैठा
लिख रहा हूँ जन्म दिन के गणित की कविता
न केक न केण्डिल न मिठाई
न ही कोई संगी-साथी
और न ही कोई हेप्पी बर्थ डे टू यू ।

07.07.2007शनिवार रात 10.00बजे
मैने ईज़ाद की कविता

डमरू के डम डम से
बिखर गए शब्द
ब्रह्माण्ड के अण्ड से फूट पड़े स्वर
वीणा के नाद से गूंज उठा नाद
शंकर के नृत्य से तरल हुए भाव
भारती के नयनों से निकल पड़ा विभाव
शिव की जटा से बह निकली सरिता
एकत्र कर सार उपकरण
मैने इजाद की कविता ।
उषा के भाल पर
छिड़क गया सिन्दूर
सूरज की किरणों से
बिखर गया नूर
फूलों से टपक पड़ा
कोमलता का भाव
यौवन की चल पड़ी
चंचल सी नाव
मदमाती इतराती
विहंस पड़ी गर्विता
अम्बर के पास से
मैंने ईजाद की कविता ।
बरस पड़ा रस
नवरंग नवरस में
जीवन गया बस
निर्धन की झोपड़ी में
रिक्त पड़े कक्ष
सीमा पर फौजी है
कर्मठा में दक्ष
ममता के आंचल से
बहा नेह राग
पी के अधरों पर
पे्रममय पराग
कली-कली,पुष्प-पुष्प
भौरा है गाता
सृष्टि के प्रांगण में
मस्त हो जाता
रचडाली शब्दों की
सुन्दर सी सरिता
अभिव्यंजना के रंगों से
मैंने ईजाद की कविता ।
000
भेड़िये कभी छिपते नहीं

दोस्त बनकर
दुश्मन जब
आपस में मिलना शुरू कर दे
करें मित्रों की तरह व्यवहार
लगे रिश्तों में अपनापन ।
दोस्त बनकर
जब दुश्मन
जागरूक हो जाए
पेश आए सावधानी से
मांगने लगे दुहाईयाँ
लगे मिमियाने भेड़ों की तरह।
दोस्त बनकर
जब दुश्मन
उतारने लगे बलैया
तारीफों के लगे बाँंधने पुल
करने लगे मित्रों की बुराइयाँ।
दोस्त बनकर
दुश्मन जब
वर्जनाएं लगे तोड़ने
पहनने लगे जामा सभ्यता का
धतियाने लगे परम्परा
लगे बिचकाने मुँह
दिखाकर अपनापन ।
दोस्त बनकर
जब दुश्मन
चढ़ाने लगे मनौतियाँ
पहनाने लगे माला फूलों की
लगाने लगे मरहम घावों पर
बगल में छिपाए हुए कटारी से
छिलने लगे तलवें
लगे खोजने अर्थ मलतब के ।
दोस्त बनकर
दुश्मन जब
मिलने लगे आपस में लगे
साम्प्रदायिकों सी चलें चालें
सभ्यतमा का दुशाला ओढ़े हुए ।
आज हमारे बीच से ही
कुछ दुश्मन कर रहें होंगे
एक दूसरे के खिलाफ
एक दूसरे के लिए
धिनौना संघर्ष....
दोस्त बनकर
अपनत्व दिखाएं
शेर की खाल में भेड़िए
कभी छिपते नहीं ।
08.07.2008 मंगलवार

काव्य

बर्तनवाली

सुबह और शाम
बर्तनों के बीच
लगातार टसते हुए
जिन्दगी कब से हो गई फुर्र
बर्तनों की चमक
निखर आई है
बाई के चेहरे पर
खुश नहीं है बाई उससे
मजबूरी है बर्तन माँजना
सदीZ गर्मी बरसात हो चाहे
बाई का हर मौसम बर्तन होते हैं
जीवन के सपने बड़े जतन से बाई
बर्तनों में देखती है ।
0
कुत्ता और हडडी

कुत्ता हडडी बड़ी देर तक चबाता है
अक्सर उसे पूरे पांच साल लग जाते हैं
चबाते हुए हडडी
बडड्ी चबाना उसका शगल है
कभी कभी वह
झपटट् मारता है
दूसरे के मुंह से छीनने के लिए
कभी वह कामयाब होता है
कभी वह नाकामयाब होता है
एक बार मंह में हडडी आने पर
वह इतनी मजबूती से दबाए रखता है
कि कोई दूसरा कुत्ता झपट न लें उसके मुंह से
गुर्राता भी है कुत्ता
डराने के वास्त
ताकि कोई दूसरा कुत्ता
छीन न लें हडडी उसके मुंह से
चबाते चबाते हडडी भले ही टूट जाए
लेकिन छूटने न पाये मंह से
कोशिश लगातार चलती रहती है और चलते रहेगी
कुत्ता कोई भी हो
पूरे पाच साल तक
हडडी चबाना उसका शगल हो जाता है।
00
आदमी ब्लाउस जैसा कमीज पहन सकता है ।

यह सवाल जहन में उठना लाजमी है
शर्मो-हया की हद होती है या नहीं
मुझे नहीं है ज्ञात
किसी एक वर्ग की नही है यह बपौती
वैसे शर्मा-हया आरक्षित है
जैसे आरक्षित है
सभ्यता,संस्कृति और
कायदें सभी के लिए ।
कायदों में ज्यादा छूट दी गई है
जैसे खुली पीठ और
नाभी दर्शन कराते हुए उजले पेट
साँचीनुमा उभरे उरोज
दिखाई देते मुख्य व्दार
गोरी-गोरी मखमली लम्बी चिकली बांहे
झांकते हुए बगलों की कमनीयता
लचकते कमर का भूगोल
मौसम की दरकार नहीं
ठिठुरते पौष में भी
भला लगता है प्रदर्शन ।
अक्सर सोचा करता हूं
नख-शिख तक क्यों
ढका होता है पुरूष
पेट फूल,शर्ट-फूल,कोट-फूल
फूल मौजे तसनों से कसे जूते
हाथों के पंजे
गर्दन से सिर तक अंग
जायज है सिर्फ दिखाने के वास्ते
अपनी गरीमा बनाए रखने के लिए ।
मेरी गुजारिश सिर्फ इतनी है
मर्द ब्लाउस जैसा कमीज
पहन तो सकता है न र्षोर्षो
चौड़ा वक्ष-पीठ,कमर उन्नत कांधे
और नाभियुक्त उदर
पौरूषता लिए विशाल वक्षस्थल पर
लहराते घनकेशपाश
दर्शन करवा तो सकते हैं
रख सकते हैं सुड़ौल बलिष्ठ खुली भुजाएं
पहन सकते हैं ब्लाउस जैसा कमीज ।
सबसे अहं बात है
मर्द अपने जिस्म पर
कम से कम वस् पहन
कैटवाक कर सकता है रैंप पर...
सुन्दरता का परचम
फहराया जा सकता है
इतनी तो मोहलत
मिली ही चाहिए मर्द को ।

रचनाएँ

कचरा बीनने वाली लड़की : भागू

वह टी टी नगर के कूढ़ों पर
मैले कुचैले कपड़ों में
कचरा बीनते फिरती है
गँदली-मैली सी सुन्दर लड़की
मन ही मन गुनगुनाया करती है
कोई रंगीला पे्रम गीत
लरजते हैं उसके अधर
किसी लजीली बात पर
साफ करते हुए कचरा
थिरकने लगते है उसके पैर
मन ही मन मुस्कराती है
उज्ज्वल भविष्य का सपना लिए
मिल ही जाती है
कोई न कोई वस्तु पुराने कपड़ों मे
लिपिस्टिक, नैलपॉलिश या आईब्रो
उड़ने लगते है उसके रेतीले ख्वाब कबूतरों की तरह
प्रयास करती है वह
दूर आकाश में उड़ने का
निहारा करती है वह घरों में
झाँक झाँक कर कौतुहल से
टी व्ही सोफा कूलर रंग बी रंग सजावटे
झट से तोड़ लेती है वह
किसी आँगन में खिला गुलाब
जुड़े में खोंसने का करती है नायाब प्रयास ।
आधी अध्ूरी लिपिस्टिक से
रंग लेती है वह
काले काले मटमैले रतनारे होंठ
टूटे हुए शीशे में लगती है निहारने
अपना रंग रुप
और धीरे से लगा लेती है ठुमका ।
मचलती है वह किसी बात पर
देखती है इधर -उघर
निहार ले उसे कोई
वह भी तो सुन्दर लग रही है
छेड़ जाता है जब कोई उसे
बिखर जाता कचरा उसका
उखड़ जाती होंठों की लाली
उसकी गर्द से भर जाता है सारा शहर
टूट जाता उसका सपना
नहीं बन सकती वह
ऐश्वर्या राय सी सुन्दर
गुनगुनाती है मन ही मन
कोई रंगीला पे्रम गीत
किसी लजीली बात पर ।
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माँ

खाना पकाते हुए
मैं अपनी माँ के बारे में
सोचा करता हूँ ।
तुमने कभी
खाना पकाते हुए
माँ के बारे में सोचा है !
अच्छी बात है
माताओं के बारे में सोचना
अपनी अच्छाई उजागर होती है ।
हम कुछ ऐसा हो सकते हैं
पर सोचने में कठिनाई यह है कि
हम ऐसा हो नहीं सकते
होते तो माँ के अतिनिकट होते
और माँ जैसे होते ।
कितने करीब आना होता है माँ के
माँ जैसा होने के लिए
माँ दोनों समय खाना पकाती है
क्या हम भी
माँ के लिए खाना पका सकते हैं
जब उसे हमारी आवश्यकता हो ।
क्या हम भी
माँ के बारे में सोचते हैं
निकट या दूर से ।
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काकी

काकी बरसों से भूखी थी
और पे्रमचन्द
भोजन परोसना भूल गए थे
भूख तो भूख होती है
चाहे अच्छा खाना मिल जाए या साधारण
भूखे को भोजना मिलना चाहिए ।
जैसे ही सुगन्ध महकती है
काकी की भूख बढ़ जाती है ।
दो इंच की ज़बान मचलती है
पानी आ जाता मुख में
चोरी से खाने का मन होता हे
कभी कभी चोरी से
खाने की घटना घटित हो जाती है
वैसे चोरी से खाने का
मज़ा ही कुछ और होता है
ताकना झाँकना विवशता हो जाती है काकी की
प्रतीक्षा करनी होती है
कोई आकर परोस दे खाना ।
सारे मेहमान उस दिन खाना खाकर चले गए
काकी अपने कमरे में करती रही प्रतीक्षा
बहू बेटे ने सुध ही नहीं ली काकी की
मजबूरन झूठे पत्तलों को टटोल टटोलकर
झूठन खाती रही।
आज भी काकी भूखी है कई घरों में
समय पर खाना मिल जाए तो कभी झूठे पत्तल
टटोलना नहीं पड़ेंगे किसी काकी को।
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गेट आउट

जब चाहे तब
गेट आउट किया जाता है मुझको
जैसे गुस्से में निकाला जाता है
नौकर को कमरे से ।
बड़ी मिन्नत मनौती के बाद
वे कहते है
चलो ठीक है लेकिन
अपनी औकात में रहा करों
आइन्दा ऐसी गलती नहीं होनी चाहिए ।
अँंगूठे से कुरेदते हुए ज़मीन
दाँतों में दबाएं हुए आँचल
हामी भरनी होती है
तब कहीं जाकर वे भीतर बुला लेते है
शरणार्थियो की तरह सशर्त ।
मेरा कहीं भी वजूद नहीं रहता
ज़रा सी चूँ चपट होने की देर है
बिना किसी मुरव्वत के
गेट आउट की जा सकती हूँ
मेरे ही दम पर चलती है उनकी गृहस्थी
सुबह का नाश्ता
दोपहर का लंच
और रात का खाना
टाइम पर दूध और दवाइयाँ देना
संभव नहीं है मेरे बग़ैर ।
ये जो घर है
महज़ खिड़की दरवाज़े फर्नीचर
बर्तन भाण्डो से नहीं बनता
इसे बनाया जाता है एक अदद औरत से
अपनी सम्पूर्ण आत्मा
ऊँढ़ेल कर
गेट आउट उनका आखिरी दाँव है
तीस दिनों के महिने भर में
उन्तीस दिन गेंट आउट होना पड़ता है
बहुत ही बेइज्जती के साथ
फिर भी उनका मन नहीं मानता ।
झेलना पड़ता है बार बार गेट आउट की जिल्लत
बावजूद इतना सब होने के
गेट इन होती हू
उनको भी
आने वाले समय में
गेट आउट करने का संकल्प लिए ।

कृष्ण जन्म

थी मध्य निशा की पुनित बेला,औ´
आच्छादित मेघ श्रृंखला व्यापार
रजनिकर मुख छिपा क्षितिज में
घुप् तम पथ था पारावार ।-1

तिमिर में भी ज्योति पूँज आलोड़ित होता
घनन् घनन् घन घनन् घनन् घन मेखला
पार व्योम से झांकता वह चितवन चकोरा
जाने किसका होगा वह चंचल चपल छोरा ।-2

मलयानिल बयार मधुर घ्राँण रंध सुवासित
कौन है वह जो करता हृदय को वििस्मत
कौन है वह जो होता पुलकित बार बार
कौन है वह जो प्रमुदित होना है चाहता
कौन है वह जो होना चाहता सृजनहार ।-3

ऐसे में निपट कौन मौन अस्तित्व लिए
विहंसता सह कुसुमित सा सुकुमार
तड़-तड़ तोड़ लौह बन्ध मुक्त वह
प्रगट हुआ एक शिशु बीच कारागार ।-4

कोमल लघु पावन चरण धरा धर
विभु नयन सम्मुख हो महा-मनोहर
विहंस पड़ी अधराधर मधु मुस्कान
यही होगा इस युग का महान गान ।-5

कोई कल्पनातीत निशा मध्य कर उजियाला
कर अलौकिक तन-रजनि में था उगनेवाला
उस पराशक्ति का अनुभूतिजन्य था विकास
कर रहा था तम का वह पल क्षण उपहास ।-6

जिस काल खण्ड में लोक लीलामय जनमता
भव धनु वितान उस भू पर विभु का तनता
विधि विधान विविधमय वह कर जाता
वह धरा पर उसी क्षण अवतरित हो जाता ।-7

जिस क्षण सांसारिक माया स्वपन टूटता
महाकण्ठ से बरबस युगल गान गूँज उठता
दिग-दिगन्त तक प्रतिध्वनित हो उठती तान
सकल जगत उल्लासित गा उठता वह गान ।-8

जिस क्षितिज से वह मन्द मन्द मुसकाया
विधि ने रच दी अपनी अद्भूत माया
साधुजनों का करने को वह परित्राण
संकल्परत धर्मध्वजा का होगा अभ्युथान ।-9

अवतरण तब उसका जब नाद ब्रºम गुँजाया
हो गई विमोहित वीणा-वादिनी की माया
झंकार उठी दिशा-दसों औ´अखिल ब्रºमाण्ड
विविध कण्ठ ने आवाहन उसका गाया ।-10

अखिल विश्व प्रमुदित उल्लासित हो झूमा
किंकर-गन्धर्व-अप्सराएं मृदंग झाँझ नृत्य होमा
समूह गान स्तुति लय ताल छन्द युगल हो गाए
व्योम अवनि अम्बर तल अनन्त धरा भी घुमा ।-11

खग-मृग-व्याघ्र जीव-जन्तु मानव हृदय हषाZये
लता कुँज वन नद नाल सरोवर अलसाये
नहीं रूकता निरन्तर अल्हादित होता उल्लास
उसके अधरों पर जगमग जगमग होता उजास ।-12

पराजित होना उसने कभी सीखा नहीं
हारने पर भी सदा गुदगुदाता था रहता
कभी चरण रज प्रक्षालन में पीछे हटा नहीं
होकर अपमानित फिर भी वह था मुस्काता ।-13

निकुँज कुँजवन में लुकता छुपता उसका छलवाना
चपल चंचल चतुर चितचोर का चितराना
भला कौन नहीं चाहेगा ऐसे में भुजबन्ध मिलाना
वृषभानुसुता को मधुर मुरली का सुनाना ।-14

मानवता की खारित उसने गान गीता का गाया
जीवन सारा कर उत्सर्जित फिर भी वह मुस्काया
मेरे कृष्ण तुम तो मेरे प्राणों के हो आधार
आओ तो कर लूँ मैं तुमको जी भर के प्यार ।-15

मंगलवार, ८ दिसम्बर २००९

ई बुक्स

मेरी पुस्तकें ई बुक्स निम्न पते पर पढ़ने के लिए उपलब्ध है।
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बुधवार, २ दिसम्बर २००९

भोपाल गैस त्रासदी

काली रात
ये कैसा धुआं है
जो निगल रहा है शहर
ये कैसा धुआं है
जिसकी पूंछ शहर के
इस सिरे से उस सिरे तक लम्बी है
ये कैसा धुआं है
जिसका मुंह सिरसा की तरह
इस सिरे से उस सिरे तक खुला है ।
ये कैसा धुआं है
निगल रहा है जो शहर
सिर और पूंछ से लगातार
शहर के बाशिन्दे
समाये जा रहे हैं जहरीले धुंएं के मुंह में
ये शहर धुएं में है या
ये धुआं शहर में है
शहर में धुआं है और धुएं में शहर है
लेकिन यह वाकया कि
धुंऐ ने सारे शहर को निगल डाला है
और शहर निष्प्राण हो गया है
इस जहरीले धुएं के मुख में ।
0
शव यात्रा
इन हाथों ने उठाए है
डेढ़ हज़ार सs ज्यादा शव
और एक ही चिता पर
डेढ हजार शवों को रखा ।
शवों के उदरों से
पास होती मिक गैस
और पास ही मृत पड़ी
सडांध से युक्त दस बारह भैसें
वो रिसती हुई लार शवों की
मेरे वस्त्रों को तर करती रही
आज भी समाई है वह दुर्गंध
शवों की मिक गैस की
पूरा शमशान शवों से भरा हुआ
बच्चे बूढे
औरत लड़कियां
कौन मुस्लिम कौन हिन्दू
कौन सिक्ख कौन ईसाई
इन हाथों ने उठाई है उनकी लाशें
और सभी को एक ही चिता पर
लिटा कर अंतिम संस्कार किया गया
धड़कता रहा मेरा हृदय तेजी से
सप्ताह दो सप्ताह
शवों के चेहरे मंडराते रहे आखों में
वह दुर्दिन अब भी याद है
याद आते ही रो पड़ता है मन
कहता है
अजी हां मारे गए इन्सान..
0
नोट -.मैंने गैस त्रासदी के समय अपने हाथों से लगभग डेढ़ हज़ार से ज्यादा शव उठाएं है और उन्हे चिता पर लिटा कर अन्तिम संस्कार किए है । स्मशान का वह दृश्य आज भी मेरे दिमाग में जस का तस है ।
कृष्णशंकर सोनाने

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कृष्णशंकर सोनाने
भोपाल, मध्य प्रदेश, India
कृष्णशंकर सोनाने एफ 88.2 तुलसी नगर,भोपाल मप्र दूरभाषः 07554229018,चलितवार्ताः 09424401361 प्रकाशित कृतियां-वेदना,कोरी किताब,बौराया मन,संवेदना के स्वर,दो शब्दों के बीच,धूप में चांदनी,मेरे तो गिरधर गोपाल,किशोरीलाल की आत्महत्या,निर्वासिता..गद्य में गोरी.उपन्यास,आदिवासी लोक कथाएं,कुदरत का न्याय.बाल कहानी संग्रह,क्रोध, प्रेस में उपन्यास.केक्टस के फूल,लावा
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